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सदभाव को बढ़ाने के लिए मुस्लिम समाज काशी और मथुरा खुशी-खुशी सौंप दे-महामण्डलेश्वर परमानंद गिरि
August 2, 2020 • BABLI JHA • current

हरिद्वार। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के न्यासी ,श्री निरंजनी पंचायती अखाड़ा के महामंडलेश्वर और साध्वी ऋतंभरा के गुरु युगपुरुष स्वामी परमानंद गिरि ने मांग की है कि मुस्लिम समुदाय के लोगों के द्वारा लाई गई मिट्टी को हम अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के शिलान्यास में लेने को तैयार हैं यदि वे हमें खुशी-खुशी दो स्थान काशी और मथुरा सौंप दें। इससे दोनों समुदायों के बीच सद्भाव बनेगा। हम राम ,शिव और कृष्ण के भक्त हैं और हमारी इन पावन पवित्र स्थानों के प्रति अपार श्रद्धा और आस्था है। मुस्लिम समुदाय के इस कदम से गंगा जमुनी तहजीब को और अधिक मजबूती मिलेगी कांग्रेस की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि वैसे भी एक पार्टी गंगा जमुनी तहजीब की बार बार बात करती है। उन्होंने कहा कि जब श्री राम जन्मभूमि आंदोलन चला था। तब राम भक्तों ने नारा दिया था,‘अयोध्या, मथुरा विश्वनाथ, तीनों लेंगे एक साथ ‘और अब समय आ गया है कि देश में सद्भावना और भाईचारे के लिए मुस्लिम समुदाय को काशी विश्वनाथ और मथुरा के श्री कृष्ण जन्मभूमि स्थल का कब्जाया गया परिसर हिंदुओं को वापस कर देना चाहिए।  महामंडलेश्वर स्वामी परमानंद गिरि ने कहा कि काशी और मथुरा को हासिल करने के लिए फिलहाल हम लोगों की आंदोलन चलाने की कोई योजना नहीं है क्योंकि कोई भी आंदोलन एक व्यक्ति के द्वारा नहीं संगठन के द्वारा चलाया जाता है, परंतु यह दोनों स्थान हमारी आस्था और भावना से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि राजीव गांधी ने मजबूरी में राम जन्मभूमि स्थल पर भूमि पूजन शिला पूजन की अनुमति दी। उनकी भूमिका से ज्यादा मजबूरी थी, क्योंकि वे राजनीति रूप से बर्बाद हो रहे थे और उन्होंने बाद में राजनीतिक मजबूरी के चलते शिला पूजन पर रोक लगा दी परंतु कोर्ट ने उस रोक को हटा दिया।   उन्होंने कहा कि आजाद भारत में हिंदू नंबर दो के नागरिक बन कर रहे। विभिन्न राजनीतिक दलों ने हिंदुओं के को लेकर पक्षपात की भाषा बोली और हिंदुओं का बार-बार अपमान किया। वोटों के लालच में गलत लोगों को आगे बढ़ाया गया। मंदिरों के लिए यह बोला गया कि हम ईट पत्थर की लड़ाई लड़ रहे हैं और मस्जिद को कुछ राजनेताओं ने पवित्र मस्जिद बताया यानी हमारे हमारे मंदिर ईट पत्थर हो गए । उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साधु की संज्ञा देते हुए कहा कि वे नवरात्रि के व्रत रखते हैं, गंगा की आरती करते हैं ,शिव का अभिषेक करते हैं। साथ ही संसद के द्वार पर मत्था टेकते हैं। वे प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार अयोध्या जा रहे हैं। संतों के लिए बहुत खुशी की बात है और मैं तो बेहद ही खुश हूं, मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है।      विनोबा भावे  का उदाहरण देते हुए महामंडलेश्वर परमानंद गिरी ने कहा कि एक राजनीतिक पार्टी ने विनोवा जी से राजनीति में आने को कहा तो उन्होंने साफ इनकार करते हुए कहा कि राजनीतिक खारे समुद्र की तरह है जिसमें नदियों का मीठा जल भी खारा हो जाता है और समुद्र का खारा पानी नदियों के जल को मीठा नहीं कर सकता है। इसीलिए राजनीति ऐसे खारे जल की तरह जिसमें जाति, भाई भतीजावाद और पार्टियों का दबाव व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। इसलिए संतो को राजनीति से दूर रहना ही चाहिए। उन्होंने खुलासा किया कि राम जन्मभूमि आंदोलन के समय उनकी शिष्या साध्वी रितंभरा को राज्यसभा में भेजने का प्रस्ताव आया था।जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था, क्योंकि संत का काम राजनीति को दिशा देना है, कोई पद लेना नहीं।      उन्होंने कहा कि शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने राम जन्मभूमि आंदोलन का हमेशा विरोध किया और ना ही वह इस आंदोलन में शामिल रहें। यह आंदोलन तो संतों और विश्व हिंदू परिषद ने चलाया और अब वे विवाद पैदा करने के लिए शिलान्यास के मुहूर्त का मुद्दा गलत ढंग से मुद्दा उठा रहे हैं । अभिजीत नक्षत्र में मंदिर का शिलान्यास किया जा रहा है, जो सबसे अच्छा मुहूर्त है।