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उत्तराखंड में देववाणी संस्कृत शिक्षा का विकास-गणेश बिष्ट
August 12, 2020 • BABLI JHA • other

हरिद्वार। उत्तराखंड राज्य देवभूमि के नाम से भी जानी जाती है। दो दशक पूर्व ही निर्मित यह भूमि प्राचीन काल से ही शिषि-मुनियों की तप स्थली रही है।कण्व,वशिष्ठ तथा वेदव्यास आदि ऋिाि मुनियों ने यहा तप कर इस भूमि का मान बढ़ाया। संस्कृत में हिन्दू धर्म से सम्बन्ध्ति सभी ध्र्मग्रन्थ लिखे गये है। बौद्वधर्म विशेषकर महायान तथा जैन धर्म के भी कई महत्वपूर्ण ग्रन्थ संस्कृत में लिखे गये है। आज भी हिन्दू धर्म में अधिकतर यज्ञ और पूजा संस्कृत में ही होती है। संस्कृत केवल एकमात्रा भाषा ही नही है अपितु संस्कृत एक विचार है। संस्कृत संस्कृति का संस्कार है। संस्कृत में विश्वरूप कल्याण है,शांति है,सहयोग है वसुधैव कुटुम्बकम की भावना है। मै उपरोक्त सच्चाई को वर्तमान संस्कृत शिक्षा से जोड़ना चाहता हॅू। इसमें कल्याणकारी भाषा होने के बाद भी आज संस्कृत भाषा का अपकर्ष काल चल रहा है। लोग इस भाषा के महत्व को समझते हुए भी इसे स्वीकार करने में संकोच करते है। जो अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है,मै उत्तराखंड राज्य की संस्कृत शिक्षा के विषय में अपने विचार व्यक्त कर रहा हैू जो सच्चाई के अत्यंत निकट है वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखण्ड राज्य अस्तित्व में आया,राज्य स्थापना के करीब सात वर्षो बाद सम्पूर्णानंद संस्कृत विवि से अलग राज्य में पहला संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार में बना। अपना एक स्वतंत्र परिषद भी बनाया गया है। उत्तराखण्ड में करीब 88 संस्कृत महाविद्यालय तथा संस्कृत विद्यालय संचालित किये जा रहे है,परन्तु दुर्भाग्य कका विषय है कि इनके अनेक प्रकार की विसंगतियाॅं है। संस्कृत भाषा का विकास की बात करने वाले ही इसे अवपोषित कर रहे है। अपने मुख्यमंत्री काल में डा0रमेश पोखरियाल निशंक ने संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया,क्योंकि वे स्वयं भी संस्कृत शिक्षा से जुड़े रहे है। इससे पूर्व 2005में भी तत्कालीन मुख्यमंत्री ने संस्कृत अकादमी और संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना कर राज्य में संस्कृत को पोषित तथा विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ा दिये। इसी तरह तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवनचन्द्र खण्डूडी ने भी संस्कृत भाषा के लिए कई कार्य किये। इन सभी के प्रयासों के द्वारा आज देवभूमि उत्तराखण्ड में हरिद्वार और ऋषिकेश को संस्कृत नगरी घोषित किया गया तथा उत्तराखण्ड राज्य में रेलवे स्टेशनों सरकारी कार्यालयों तथा महत्वपूर्ण संस्थाओं के नाम संस्कृत भाषाओं में लिखे गये है। आज उत्तराखण्ड में संस्कृत विद्यालयों के छात्र देश के विभिन्न संस्थाओं जैसे रक्षा सेवाओं पुलिस सेवा,शिक्षा तथा ज्योतिष एवं पुरोहिताई के क्षेत्र में कार्य कर रहे है तथा राज्य में दो कन्या महाविद्यालय जहां बालिकाओं को शिक्षा संचालित की जा रही है। क्रमशः द्रोणचार्य कन्या गुरूकुल देहरादून तथा बालिका संस्कृत विद्यालय सैंदुर टिहरी गढ़वाल की बालिकाएं संस्कृत के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य कर रहे है। इसके अतिरिक्त राज्य के विभिन्न संस्कृत स्कूल के छात्र भी न केवल शिक्षा के क्षेत्र में वरन् अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में राज्य और देश में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे है। हमारी व आप सब की यह कोशिश होनी चाहिए कि सब मिलकर संस्कृत व अपनी संस्कृति को जोड़े  और इस भाषा को ग्रहण करते हुए इसमें गर्व अनुभव करे । हम सबका प्रयास होना चाहिए कि इस भाषा को न केवल राज्य बल्कि देश के हर क्षेत्रा में हर व्यक्ति तक पहुचाने का कार्य करें।